उनका वो अंदाज़-ऐ-करम, उनपे वो आना दिल का,
हाय वो वक़्त, वो बातें, वो ज़माना दिल का.
न सुना उसने तवज्जो से फ़साना दिल का,
उम्र गुजरी है मगर दर्द ना जाना दिल का,
दिल्लगी दिल लगी बनके मिलता देती है,
रोग दुश्मन को भी, यार अब ना लगाना दिल का,
वो भी अपने ना हुए, दिल भी गया हाथों से,
ऐसे आने से तो बेहतर था, ना आना दिल का.
उनकी महफ़िल में "नरेश", उनके तबस्सुम की कसम,
देखते रह गए हम, हाथों से जाना दिल का.
No comments:
Post a Comment